नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से फिलहाल रोक लगाए जाने के बाद भले ही सरकार को राहत मिली हो, लेकिन इससे बीजेपी की राजनीतिक मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रही हैं। खासकर सवर्ण जातियों के संगठनों और छात्रों में नाराजगी बरकरार है। उनका कहना है कि जब तक यूजीसी के नियम पूरी तरह वापस नहीं लिए जाते, तब तक इसका विरोध करते रहेंगे।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूजीसी का यह विवाद अब बीजेपी के लिए ‘गले की फांस’ बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद करणी सेना, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, ब्राह्मण महासभा, परशुराम सेना समेत कई सवर्ण संगठन सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान कर चुके हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है।
इस विरोध का सबसे बड़ा केंद्र यूपी है। यूपी में बीजेपी के अंदर भी इस मुद्दे को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया है।
कई स्थानीय और जिला स्तर के नेताओं ने पद से इस्तीफा तक दे दिया है। पार्टी के कुछ सवर्ण नेताओं का कहना है कि नए नियमों को लेकर समर्थकों को समझाना मुश्किल हो रहा है। एक विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि परंपरागत सवर्ण वोटरों की अनदेखी से समाज में बेचैनी बढ़ी है और यूजीसी विवाद ने इसे और गहरा कर दिया है। बीजेपी के सामने दुविधा यह है कि यदि वह यूजीसी के नियमों का खुलकर समर्थन करती है तो सवर्णों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी, और यदि नियमों को वापस लेती है तो एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के विरोध का खतरा है। ऐसे में पार्टी के लिए सामाजिक संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक दृष्टि से यूपी में यह मुद्दा और भी संवेदनशील है। प्रदेश की आबादी में ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य समेत सवर्ण जातियां करीब 22 फीसदी हैं, जिन्हें बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। जनरल कैटेगरी के युवाओं का आरोप है कि नए नियम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ को बढ़ावा देते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष बना रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को नुकसान हो सकता है।
दूसरी ओर विपक्ष ने इस मुद्दे पर सधे हुए बयान देकर सवर्ण वोटरों को साधने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अन्य दलों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए सरकार पर बिना पर्याप्त चर्चा के नियम लागू करने का आरोप लगाया है। कुल मिलाकर, यूजीसी नियमों का विवाद अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए सियासी परीक्षा बन चुका है।



